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No.492378
जब दुनिया से कटने का वक्त था,
मैं कटा नहीं।
अब दुनिया मुझे काट रही है।
तब मौसम खुला था,
दरवाज़े आधे लगे थे,
और मैं समझता था—
संबंध ही सुरक्षा हैं।
मैंने अपने चारों ओर
लताओं की तरह लोगों को लपेट लिया,
अपनी देह पर उम्मीदों की बेल चढ़ा दी।
सोचा—
जुड़ाव ही जड़ है।
पर समय बाग़बान नहीं होता,
वह छँटाई करता है।
और छँटाई में
कोमल शाखें भी बचती नहीं।
अब दुनिया मुझे काट रही है—
धीरे, व्यवस्थित,
जैसे लकड़ी को आकार दिया जाता है
किसी अनदेखे फर्नीचर के लिए।
मेरी आवाज़ के कोने घिसे जा रहे हैं,
विश्वास के छल्ले उतर रहे हैं,
और मैं सुन सकता हूँ
अपने भीतर से गिरती बुरादे की आवाज़।
शायद गलती बस इतनी थी—
मैंने ऋतु को पहचानने में देर कर दी।
जब अलग होना आत्मरक्षा था,
मैंने उसे अस्वीकार किया।
अब अलग किया जाना
मेरी शिक्षा है।
और हर कटाव के बाद
एक नया किनारा बनता है—
दर्दनाक, पर स्पष्ट।






















































